December 2007
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12/3/07 01:53 pm
लाइवजर्नल, जिसपर यह लेखा आतिथ्यित है, एक समय पर कुछ लोगों द्वारा शुरू की गई कंपनी थी, उसके बाद इसे सिक्स अपार्ट ने खरीद लिया। इसके चलते काफ़ी चीज़ें जो प्रयोक्ताओं की इच्छा के अनुसार होती थीं, अब कंपनी की इच्छानुसार होने लगीं, उदाहरण के लिए नई भाषाओं में अनुवाद बंद हो गए - शुक्र है हिन्दी पहले ही शामिल हो गई थी - और असक्रिय अनुवादकों को हटाने में भी कड़ाई बरतना शुरू हुआ। अब एक और बदलाव है कि सिक्स अपार्ट लाइवजर्नल को एक रूसी कंपनी खरीद रही है। पहले ही बहुत परेशान प्रयोक्ताओं की भड़ास देखी जा सकती है टिप्पणियों के २२ पन्नों से, जब तक आप पढ़ रहे हों शायद और भी बढ़ जाएँ। जितनी जटिल प्रणाली हो, बदलाव करना उतना ही जटिल और कष्टदायक है!
Current Mood: देखते हैं
8/6/07 01:43 am
 तो यह रही पञ्चशील -
- अज्ञातव्यक्तिव्यवहार आपको सुबह से शाम तक जो भी लोग मिलेंगे, उन्हें देख कर, नज़र से नज़र मिलाएँगे, और मुस्कराएँगे, नहीं तो कम से कम मुण्डी ऊपर नीचे हिलाएँगे। और शायद यह भी कहेंगे, "हाउर्यू डुइङ्ग? कहिए क्या हाल है?" और जवाब चाहें कुछ भी हो, जैसे "ठीक हूँ", "मर रहा हूँ", "बीमार हूँ", उससे आपको कोई सारोकार नहीं होगा। यदि आपसे कोई यही सवाल पूछे तो आपका एक ही जवाब होगा - "ग्रेट! बढ़िया है!" वैसे आप उसे कह दें कि "तेरी [18+] की [18+]" तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि किसीको आपके जवाब से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होगा।
यदि आप किसी के साथ बस में या ट्रेन में बैठे होंगे, उससे तुरन्त बतियाने लगेंगे। बतियाते बतियाते यदि अगला कुछ ऊलजुलूल बकेगा - ताकि कुछ बहस बाज़ी हो, कुछ दिलचस्प वाद विवाद हो - तो आप बस कहेगे - "दैट्स इण्टरस्टिङ्ग। हाँ, काफ़ी दिलचस्प बात कही है आपने"। बस कहानी खत्म। न कुछ बहस न कुछ विवाद। शाम को घर लौटने में आपको आधा घण्टा अधिक लगेगा, रास्ते में जितने भी लोग मिलेंगे उन्हें देख कर मुस्कराने में समय जो जाएगा। असली अमरीका में यह समस्या नहीं होगी, क्योंकि वहाँ मीलों तक कोई नज़र ही नहीं आता।
बतियाते हुए यदि कोई आपसे पूछ ले कि आपके कितने बच्चे हैं या क्या आप शादीशुदा हैं या आपके माँ बाप कहाँ है तो समझ लीजिए कि अगला हिन्दुस्तान में नया आया है। यहाँ के तौर तरीके में यह सवाल नहीं पूछे जाते।
- दूरभाषनीति किसी भी इंसान से, बिना फ़ोन खड़काए, या बिना डाक पर स्वीकृति लिए, आप मिलने नहीं जा सकेंगे, चाहे वह आपका सगा हो चाहे ठगा। आप अपने सेल फ़ोन का कम से कम इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उसमें दुतरफ़ा खर्चा होगा - बातचीत के लिए भी और समोसों के लिए भी। आप समोसे बहुत कम भेजेंगे, और ध्वनि डाक - वॉइस मेल - ज़रूर सुनेंगे। अगर किसीने आपको सन्देश भेजा - वॉइस मेल या आंसरिङ्ग मशीन के जरिए - और आपने जवाबी कार्यवाही नहीं की तो आपकी खैर नहीं। आप यह बहाना नहीं मार सकते कि आपका सन्देश नहीं मिला, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता। नतीजा यह होगा कि दो तीन बार लोग आपसे बात ही करना बन्द कर देंगे फिर आपको अकल आ जाएगी।
लेकिन आप चाहें तो किसी को फ़ोन करते हुए अपना नम्बर गोपनीय रख सकते हैं। साथ ही, यदि आपको कोई अपना नम्बर गोपनीय रखते हुए फ़ोन करता है तो उसे आप सन्देश भिजवा सकते हैं कि भैया हम बेनामों से फ़ोनों पर बात नहीं करते। यदि आपको अपने फ़ोन सेवा प्रदाता से सन्तुष्टि न हो, तो दूसरी जगह से फ़ोन ले सकते हैं - और आपका नम्बर भी नहीं बदलेगा।
पर आप पुराने दिन याद करेंगे जब फ़ोन करने के भाव अभी के एक चौथाई थे।
- यात्रानीति रेलगाड़ियाँ कहीं नहीं होंगी, जो पटरियाँ बिछी हैं, वह भी धीरे धीरे उखाड़ दी जाएँगी, और हर जगह पक्की सड़कें बना दी जाएँगी। अगर कोई गाड़ी एक लीटर में चार किलोमीटर से अधिक चल जाती हो तो उसकी वाहवाही होगी, और पैसे वाले लोग ऐसी गाड़ियों को देख कर नाक भौं सिकोड़ेगे - आ गया कञ्जूस।
हर शहर में एक हवाई अड्डा होगा। या तो आप अपनी कार से जाएँ या हवाई जहाज़ से। रेलों को सङ्ग्रहालयों में रख दिया जाएगा। रेल टिकटें केवल हनिमून या पर्यटन करने वाले लोग खरीदेंगे क्योंकि वह बहुत महँगी होंगी। इसके बावजूद - देश में एक से सवा अरब कारें होने पर भी - जब भी ट्रॅफ़िक जॅम होगा लोग चुपचाप अपनी गाड़ियों में बैठ कर अपने काम धन्धे करेंगे - जैसे कि फ़ोन पर बतियाना, खाना पीना, पढ़ाई करना, गाने सुनना, फ़िल्में देखना, और अपने दफ़्तर के नेट्वर्क पर जुड़ना, या अपने चिट्ठे लिखना। असली अमरीका में यह सब उतना अधिक नहीं हो पाता है लेकिन यहाँ अधिक कारें होने की वजह से जाम अधिक लगेंगे और इस प्रकार के काम कारों में अधिक हो सकेंगे।
गाड़ी चलाते चलाते फ़ोन पर बात करना कोई जुर्म नहीं होगा। न कोई आपसे सड़क पर रेस लगाएगा, न अपना भोंपू बजाएगा।
सामने से पैदल पार करने वाले लोग दिखते ही सब लोग चक्का जाम कर देंगे, और जब तक लोगबाग निकल न लें सारी गाड़ियाँ जस की तस खड़ी रहेंगी। ट्रेड फ़ेयर के दौरान प्रगति मैदान के आसपास और हर तीन घण्टे में फ़िल्में छूटने के समय गाड़ियों के ज़बर्दस्त जाम लगे होंगे क्योंकि लोग पैदल वालों को रास्ता देते हुए चार घण्टे की लम्बी फ़िल्में देख रहे होंगे।
हाँ, सीट बेल्ट न लगाई हो तो तुरन्त जुर्माना हो जाएगा। यदि आपसे कोई यह पूछने आए कि रेल्वे स्टेशन के लिए कौन सी बस जाएगी तो समझ लीजिए कि हिन्दुस्तान में नया आया है। आप कभी किसी से रास्ता नहीं पूछेंगे, केवल गूगल मैप्स से काम लेंगे या अपनी कार में लगे जीपीऍस से रास्ता पूछेंगे। लिहाज़ा आपको कहीं से कहीं जाने का रास्ता कतई याद नहीं होगा।
लोगबाग यह नहीं पूछेंगे कि आप कौन से पद पर हैं, या आपके बाप दादा क्या थे, बस यह देखेंगे कि आपके पास कार कौन सी है, बल्कि आपसे मिलने के बाद, और आपकी कार देखे बिना वे काफ़ी सही सही यह अन्दाज़ा लगा लेंगे कि आपके पास कौन सी कार है।
- समयनीति हर चीज़ समय से शुरू होगी और समय से खत्म होगी, चाहे हवाईजहाज़ के उड़ने का समय हो या अप्पू घर में झूले चलाने का समय हो। कम से कम एक दिन पहले आपने निश्चित कर लिया होगा कि अगले दिन आप किस समय क्या कर रहे होंगे। और यदि आप वैसा नहीं कर पाए तो अगले दिन आपको बहुत कोफ़्त होगी, उतनी ही कोफ़्त जितनी मजबूरी में महँगी चीज़ खरीदने पर होती है। यदि आपको नियत समय पर किसी जगह न पहुँच पाने का अन्देशा होगा तो आप कम से कम एक घण्टे पहले सूचित करेंगे, और वह भी ऐसी आवाज़ में जैसे कि मातम की खबर सुना रहे हों।
और तो और मान लें कि अगले दिन आपके कुछ काम जल्दी निपट जाते हैं, तो आप ताबड़तोड़ सोचेंगे कि बचे हुए समय में क्या किया जाए, नहीं तो आपको लगेगा कि आपका समय पैसे की तरह ही जल रहा है। यह बात हर दिन, घण्टे लागू होगी, चाहें छुट्टी का दिन हो चाहे काम का।
समय का न्यूनतम मापक एक मिनट होगा, पन्द्रह मिनट नहीं।
यदि आप किसी से पूछें कि सूरज कितनी देर में उगेगा, और जवाब आता है पाँच छः मिनट में, तो समझ लीजिए कि अगला नया है। और यदि आप पलट कर यह नहीं पूछते हैं कि पाँच मिनट में या छः मिनट में? तो समझ लीजिए कि आप हिन्दुस्तान में नए हैं।
- संग्रहालयनीति जो भी चीज़ अजीबोगरीब होगी, उसे बचा कर संग्रहालयों में रखा जाएगा। जो भी चीज़ पच्चीस साल से पुरानी होगी, उसके नाम का स्मारक बना दिया जाएगा, चाहे वह मोहल्ला हो, या सड़क, या रेल्वे स्टेशन। रेलगाड़ियाँ तो अजायबघरों में होंगी ही। उसी प्रकार जो भी लोग अजीबोगरीब होंगे, जैसे हिन्दी में चिट्ठा लिखने वाले, भरतनाट्यम् सीखने वाले, इञ्जीनियर डॉक्टर बनने वाले, डॉक्टर इञ्जीनयर न बनने वाले, केवल शाकाहार करने वाले, शाकाहार न करने वाले, नई नवेली चीज़े बनाने वाले, अजीबोगरीब कारनामे करने वाले, इन सबके ऊपर खासतौर पर संस्थाएँ बनेंगी जो उनकी विविधता के ऊपर "दैट्स इण्टर्स्टिङ्ग! काफ़ी दिलचस्प है!" कहेंगी। किसी भी क्षेत्र में अजीबोगरीब चीज़ें करने वालों के मुँह में घी शक्कर डाला जाएगा, क्या पता किस शगल से पैसे उगल आएँ।
बहरहाल, जो लोग हिन्दुस्तान आ कर कहेंगे कि हमें फ़िल्मों की तरह पूरा नाचता गाँव दिखाओ, उन्हें मुम्बई के फ़िल्मी संग्रहालयों का रास्ता दिखा दिया जाएगा, गूगल मैप्स पर। यहाँ सभी तरह के अजायबघर देखने के बाद में हिन्दुस्तान आने वालों को अहसास होगा कि उनके देश और हिन्दुस्तान में फ़र्क तो हैं, पर वह फ़र्क नहीं हैं जो उन्हें फ़िल्मों और टीवी पर दिखाए गए थे।
टिप्पणी करने की कड़ी ऊपर है, लेकिन कई लोगों को ब्लॉग्स्पॉट के खाकों की आदत है, अतः नीचे भी दे रहा हूँ। वैसे लाइवजर्नल बुरा नहीं है। टिप्पणी करेंanugunj, अनुगूँज
8/1/07 03:50 pm
देख रहा हूँ कि चिट्ठाजगत का लघु दावा कूट शीर्षक मात्र में चलता है या नहीं।
10/11/06 02:23 pm
गब्बर - कितने आदमी थे? सांभा - सरदार 2 गब्बर - मुझे गिनती नहीं आती, 2 कितने होते हैं? सांभा - सरदार 2, 1 के बाद आता है गब्बर - और 2 के पहले? सांभा - 2 के पहले 1 आता है। गब्बर - तो बीच में कौन आता है? सांभा - बीच में कोई नहीं आता गब्बर - तो फिर दोनो एक साथ क्यों नहीं आते? सांभा - 1 के बाद ही 2 आ सकता है, क्यूँकि 2, 1 से बड़ा है। गब्बर - 2, 1 से कितना बड़ा है? सांभा - 2, 1 से 1 बड़ा है। गब्बर - अगर 2, 1 से 1 बड़ा है तो 1, 1 से कितना बड़ा है? सांभा - सरदार, मैंने आपका नमक खाया है, अब मुझे गोली खिला दो!
- दफ़्तर के सूचना पट से
Current Mood: खुश
Current Music: प्यासा
8/4/06 11:33 am
अब अच्छी तरह सोच लेना।
Current Mood: क़ानूनी
Current Music: अन्धा क़ानून
8/2/06 10:09 pm
जब भी भारतीय रेल के अधिकृत सरकारी जालस्थल पर जा कर 9 तारीख का टिकट कटाने की कोशिश करता हूँ, भारत सरकार धोबी पछाड़ दे के 9 तारीख को आज की - 2 तारीख बना के कह देती है कि कोई ट्रेनें उपलब्ध नहीं हैं।
खैर, लालू ने भी रेलवे को मुनाफ़ेदार मालगाड़ियों के जरिए बनाया है, हम जैसे स्लीपर क्लासियों की बदौलत नहीं। पर यह भी हो सकता है कि ये जालस्थल का मियादी बुखार हो। लगता है कि शाम आठ से नौ के बीच का समय टिकट बुक कराने के लिए सबसे उम्दा है। आजमा के देखता हूँ कल रात। इस बीच नज़र डालिए पन्ना ए परिचय उल हिन्दी पर।
Current Mood: लाल आँखी
Current Music: ये तेरा घर ये मेरा घर
7/26/06 11:42 am
क़ानूनी सलाह की सबको ज़रूरत पड़ती है। क़ानूनगोओं का यहाँ स्वागत है। यदि आपकी कोई क़ानूनी समस्या हो - ज़मीन जायदाद, व्यापार, नौकरी सम्बन्धी - तो यहाँ लिखें। हो सकता है कि आप वकील न हों, लेकिन वैसी ही स्थिति से गुज़र चुके हों। दी गई सलाह और उसपर अमल के नतीजे के लिए डाक सूची के सञ्चालक ज़िम्मेदार नहीं।
हिन्दी की इस पहली ग़ैर तकनीकी और ग़ैर साहित्यिक डाक सूची को सफल बनाएँ।
Current Mood: क़ानूनी
Current Music: ये अन्धा क़ानून है
7/12/06 02:00 pm
मुम्बई में अब तक 160 लोग मर चुके हैं और लोग गुण गा रहे हैं इस बात का कि अगले दिन यहाँ सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा जैसा कि पहले था। और छाती ठोक के कह रहे हैं कि मुम्बई हमेशा की तरह अपनी चिता से उठ कर फिर दौड़ने लगेगा।
मैं पूछता हूँ इसमें शान की क्या बात है कि अब तक पिछले तेरह सालों में चार इसी तरह के काण्ड हो चुके हैं?
1999 में मैं मुम्बई में था। रोज सान्ताक्रूज़ से अन्धेरी और वापस जाता था, सीप्ज़ में दफ़्तर था और जुहू में घर। शाम को छः बजे दफ़्तर से निकल जाता था तो खुश होता था, कि आज जल्दी घर पहुँचूँगा। और फ़र्स्ट क्लास का पास था, तो फ़र्स्ट क्लास से ही जाता था। उसी रूट पर, उसी समय, उसी डब्बे में मैं भी हो सकता था जिसपर बम फूटे हैं।
चौथी बार अपने शहर में बम फुटवाने में गर्व की क्या बात है, मुझे नहीं समझ आता। और मैं यदि उस डब्बे में होता तो मेरे घरवालो को भी समझ में नहीं आता। अगर ये पहली बार हुआ होता, या फिर बतौर नागरिक हमें पता होता कि इससे बचने के लिए आगे क्या करना है, तो मुझे समझ आता कि अपनी छाती ठोकी क्यों जा रही है। लेकिन न हमे यह पता है कि अगले हमले कब होंगे और न यह पता है कि उनसे बचने के लिए आम नागरिक को क्या करना है।
बेरूत जब गृह युद्ध से जूझ रहा था उन्ही दिनो एक लेबनानी ने कुछ विदेशियों को दावत पर बुलाया। बाहर भारी बमबारी हो रही थी, सो विदेशी भौंचक्क थे कि ऐसी हालत में शराब और कबाब की दावत कैसे चल सकती है। यह देख कर मेज़बान ने कहा, 'क्या आप अभी जाम लगाना चाहेंगे, या फिर बमबारी के रुकने का इन्तज़ार करेंगे?' यानी वहाँ लोगबाग आम जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे और हिंसा जीवन का एक हिस्सा बन चुकी थी, एक मानी हुई बात, जिस तरह साँस लेते हैं, उसी तरह बमों की आवाज़ सुनते हैं।
अगर यही बहादुरी है और दिलेरी है तो हमसे शुतुरमुर्ग ही अच्छे। कम से कम अपना मन तो बहला लेता है, रेत में सर गाड़ कर। हम तो ऐसे बन रहे हैं कि बार बार उसी गड्ढे में कूद कर बहुत महान काम कर रहे हैं।
लन्दन में एक बार बम फूटे, न्यूयॉर्क में एक बार, माद्रिद में एक बार।
और मुम्बई में कितनी बार?
किसी कवि ने कहा है कि बहादुर एक ही बार मरता है पर कायर दिन में हज़ार बार मरता है। मैं कहता हूँ कि जो दूध का जला छाछ तो छोड़ खौलते दूध तक को ठण्डा नही करता है उस महामूर्ख को लोग कुछ समय बाद जलाने में भी अपने समय की बरबादी ही समझेंगे।
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