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आलोक कुमार
alok
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8/1/07 03:50 pm :: चिट्ठाजगत परीक्षण

December 2007
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लाइवजर्नल रूसी कंपनी ने खरीदी

लाइवजर्नल, जिसपर यह लेखा आतिथ्यित है, एक समय पर कुछ लोगों द्वारा शुरू की गई कंपनी थी, उसके बाद इसे सिक्स अपार्ट ने खरीद लिया। इसके चलते काफ़ी चीज़ें जो प्रयोक्ताओं की इच्छा के अनुसार होती थीं, अब कंपनी की इच्छानुसार होने लगीं, उदाहरण के लिए नई भाषाओं में अनुवाद बंद हो गए - शुक्र है हिन्दी पहले ही शामिल हो गई थी - और असक्रिय अनुवादकों को हटाने में भी कड़ाई बरतना शुरू हुआ।
अब एक और बदलाव है कि सिक्स अपार्ट लाइवजर्नल को एक रूसी कंपनी खरीद रही है। पहले ही बहुत परेशान प्रयोक्ताओं की भड़ास देखी जा सकती है टिप्पणियों के २२ पन्नों से, जब तक आप पढ़ रहे हों शायद और भी बढ़ जाएँ। जितनी जटिल प्रणाली हो, बदलाव करना उतना ही जटिल और कष्टदायक है!

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Current Mood: देखते हैं
अनुगूँज 22: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें

Akshargram Anugunj
तो यह रही पञ्चशील -


  • अज्ञातव्यक्तिव्यवहार आपको सुबह से शाम तक जो भी लोग मिलेंगे, उन्हें देख कर, नज़र से नज़र मिलाएँगे, और मुस्कराएँगे, नहीं तो कम से कम मुण्डी ऊपर नीचे हिलाएँगे। और शायद यह भी कहेंगे, "हाउर्यू डुइङ्ग? कहिए क्या हाल है?" और जवाब चाहें कुछ भी हो, जैसे "ठीक हूँ", "मर रहा हूँ", "बीमार हूँ", उससे आपको कोई सारोकार नहीं होगा। यदि आपसे कोई यही सवाल पूछे तो आपका एक ही जवाब होगा - "ग्रेट! बढ़िया है!" वैसे आप उसे कह दें कि "तेरी [18+] की [18+]" तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि किसीको आपके जवाब से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होगा।

    यदि आप किसी के साथ बस में या ट्रेन में बैठे होंगे, उससे तुरन्त बतियाने लगेंगे। बतियाते बतियाते यदि अगला कुछ ऊलजुलूल बकेगा - ताकि कुछ बहस बाज़ी हो, कुछ दिलचस्प वाद विवाद हो - तो आप बस कहेगे - "दैट्स इण्टरस्टिङ्ग। हाँ, काफ़ी दिलचस्प बात कही है आपने"। बस कहानी खत्म। न कुछ बहस न कुछ विवाद। शाम को घर लौटने में आपको आधा घण्टा अधिक लगेगा, रास्ते में जितने भी लोग मिलेंगे उन्हें देख कर मुस्कराने में समय जो जाएगा। असली अमरीका में यह समस्या नहीं होगी, क्योंकि वहाँ मीलों तक कोई नज़र ही नहीं आता।

    बतियाते हुए यदि कोई आपसे पूछ ले कि आपके कितने बच्चे हैं या क्या आप शादीशुदा हैं या आपके माँ बाप कहाँ है तो समझ लीजिए कि अगला हिन्दुस्तान में नया आया है। यहाँ के तौर तरीके में यह सवाल नहीं पूछे जाते।


  • दूरभाषनीति किसी भी इंसान से, बिना फ़ोन खड़काए, या बिना डाक पर स्वीकृति लिए, आप मिलने नहीं जा सकेंगे, चाहे वह आपका सगा हो चाहे ठगा। आप अपने सेल फ़ोन का कम से कम इस्तेमाल करेंगे क्योंकि उसमें दुतरफ़ा खर्चा होगा - बातचीत के लिए भी और समोसों के लिए भी। आप समोसे बहुत कम भेजेंगे, और ध्वनि डाक - वॉइस मेल - ज़रूर सुनेंगे। अगर किसीने आपको सन्देश भेजा - वॉइस मेल या आंसरिङ्ग मशीन के जरिए - और आपने जवाबी कार्यवाही नहीं की तो आपकी खैर नहीं। आप यह बहाना नहीं मार सकते कि आपका सन्देश नहीं मिला, क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता। नतीजा यह होगा कि दो तीन बार लोग आपसे बात ही करना बन्द कर देंगे फिर आपको अकल आ जाएगी।

    लेकिन आप चाहें तो किसी को फ़ोन करते हुए अपना नम्बर गोपनीय रख सकते हैं। साथ ही, यदि आपको कोई अपना नम्बर गोपनीय रखते हुए फ़ोन करता है तो उसे आप सन्देश भिजवा सकते हैं कि भैया हम बेनामों से फ़ोनों पर बात नहीं करते। यदि आपको अपने फ़ोन सेवा प्रदाता से सन्तुष्टि न हो, तो दूसरी जगह से फ़ोन ले सकते हैं - और आपका नम्बर भी नहीं बदलेगा।

    पर आप पुराने दिन याद करेंगे जब फ़ोन करने के भाव अभी के एक चौथाई थे।

  • यात्रानीति रेलगाड़ियाँ कहीं नहीं होंगी, जो पटरियाँ बिछी हैं, वह भी धीरे धीरे उखाड़ दी जाएँगी, और हर जगह पक्की सड़कें बना दी जाएँगी। अगर कोई गाड़ी एक लीटर में चार किलोमीटर से अधिक चल जाती हो तो उसकी वाहवाही होगी, और पैसे वाले लोग ऐसी गाड़ियों को देख कर नाक भौं सिकोड़ेगे - आ गया कञ्जूस।

    हर शहर में एक हवाई अड्‍डा होगा। या तो आप अपनी कार से जाएँ या हवाई जहाज़ से। रेलों को सङ्ग्रहालयों में रख दिया जाएगा। रेल टिकटें केवल हनिमून या पर्यटन करने वाले लोग खरीदेंगे क्योंकि वह बहुत महँगी होंगी। इसके बावजूद - देश में एक से सवा अरब कारें होने पर भी - जब भी ट्रॅफ़िक जॅम होगा लोग चुपचाप अपनी गाड़ियों में बैठ कर अपने काम धन्धे करेंगे - जैसे कि फ़ोन पर बतियाना, खाना पीना, पढ़ाई करना, गाने सुनना, फ़िल्में देखना, और अपने दफ़्तर के नेट्वर्क पर जुड़ना, या अपने चिट्ठे लिखना। असली अमरीका में यह सब उतना अधिक नहीं हो पाता है लेकिन यहाँ अधिक कारें होने की वजह से जाम अधिक लगेंगे और इस प्रकार के काम कारों में अधिक हो सकेंगे।

    गाड़ी चलाते चलाते फ़ोन पर बात करना कोई जुर्म नहीं होगा। न कोई आपसे सड़क पर रेस लगाएगा, न अपना भोंपू बजाएगा।

    सामने से पैदल पार करने वाले लोग दिखते ही सब लोग चक्का जाम कर देंगे, और जब तक लोगबाग निकल न लें सारी गाड़ियाँ जस की तस खड़ी रहेंगी। ट्रेड फ़ेयर के दौरान प्रगति मैदान के आसपास और हर तीन घण्टे में फ़िल्में छूटने के समय गाड़ियों के ज़बर्दस्त जाम लगे होंगे क्योंकि लोग पैदल वालों को रास्ता देते हुए चार घण्टे की लम्बी फ़िल्में देख रहे होंगे।

    हाँ, सीट बेल्ट न लगाई हो तो तुरन्त जुर्माना हो जाएगा। यदि आपसे कोई यह पूछने आए कि रेल्वे स्टेशन के लिए कौन सी बस जाएगी तो समझ लीजिए कि हिन्दुस्तान में नया आया है। आप कभी किसी से रास्ता नहीं पूछेंगे, केवल गूगल मैप्स से काम लेंगे या अपनी कार में लगे जीपीऍस से रास्ता पूछेंगे। लिहाज़ा आपको कहीं से कहीं जाने का रास्ता कतई याद नहीं होगा।

    लोगबाग यह नहीं पूछेंगे कि आप कौन से पद पर हैं, या आपके बाप दादा क्या थे, बस यह देखेंगे कि आपके पास कार कौन सी है, बल्कि आपसे मिलने के बाद, और आपकी कार देखे बिना वे काफ़ी सही सही यह अन्दाज़ा लगा लेंगे कि आपके पास कौन सी कार है।


  • समयनीति हर चीज़ समय से शुरू होगी और समय से खत्म होगी, चाहे हवाईजहाज़ के उड़ने का समय हो या अप्पू घर में झूले चलाने का समय हो। कम से कम एक दिन पहले आपने निश्चित कर लिया होगा कि अगले दिन आप किस समय क्या कर रहे होंगे। और यदि आप वैसा नहीं कर पाए तो अगले दिन आपको बहुत कोफ़्त होगी, उतनी ही कोफ़्त जितनी मजबूरी में महँगी चीज़ खरीदने पर होती है। यदि आपको नियत समय पर किसी जगह न पहुँच पाने का अन्देशा होगा तो आप कम से कम एक घण्टे पहले सूचित करेंगे, और वह भी ऐसी आवाज़ में जैसे कि मातम की खबर सुना रहे हों।

    और तो और मान लें कि अगले दिन आपके कुछ काम जल्दी निपट जाते हैं, तो आप ताबड़तोड़ सोचेंगे कि बचे हुए समय में क्या किया जाए, नहीं तो आपको लगेगा कि आपका समय पैसे की तरह ही जल रहा है। यह बात हर दिन, घण्टे लागू होगी, चाहें छुट्टी का दिन हो चाहे काम का।

    समय का न्यूनतम मापक एक मिनट होगा, पन्द्रह मिनट नहीं।

    यदि आप किसी से पूछें कि सूरज कितनी देर में उगेगा, और जवाब आता है पाँच छः मिनट में, तो समझ लीजिए कि अगला नया है। और यदि आप पलट कर यह नहीं पूछते हैं कि पाँच मिनट में या छः मिनट में? तो समझ लीजिए कि आप हिन्दुस्तान में नए हैं।


  • संग्रहालयनीति जो भी चीज़ अजीबोगरीब होगी, उसे बचा कर संग्रहालयों में रखा जाएगा। जो भी चीज़ पच्चीस साल से पुरानी होगी, उसके नाम का स्मारक बना दिया जाएगा, चाहे वह मोहल्ला हो, या सड़क, या रेल्वे स्टेशन। रेलगाड़ियाँ तो अजायबघरों में होंगी ही। उसी प्रकार जो भी लोग अजीबोगरीब होंगे, जैसे हिन्दी में चिट्ठा लिखने वाले, भरतनाट्यम् सीखने वाले, इञ्जीनियर डॉक्टर बनने वाले, डॉक्टर इञ्जीनयर न बनने वाले, केवल शाकाहार करने वाले, शाकाहार न करने वाले, नई नवेली चीज़े बनाने वाले, अजीबोगरीब कारनामे करने वाले, इन सबके ऊपर खासतौर पर संस्थाएँ बनेंगी जो उनकी विविधता के ऊपर "दैट्स इण्टर्स्टिङ्ग! काफ़ी दिलचस्प है!" कहेंगी। किसी भी क्षेत्र में अजीबोगरीब चीज़ें करने वालों के मुँह में घी शक्कर डाला जाएगा, क्या पता किस शगल से पैसे उगल आएँ।

    बहरहाल, जो लोग हिन्दुस्तान आ कर कहेंगे कि हमें फ़िल्मों की तरह पूरा नाचता गाँव दिखाओ, उन्हें मुम्बई के फ़िल्मी संग्रहालयों का रास्ता दिखा दिया जाएगा, गूगल मैप्स पर। यहाँ सभी तरह के अजायबघर देखने के बाद में हिन्दुस्तान आने वालों को अहसास होगा कि उनके देश और हिन्दुस्तान में फ़र्क तो हैं, पर वह फ़र्क नहीं हैं जो उन्हें फ़िल्मों और टीवी पर दिखाए गए थे।




टिप्पणी करने की कड़ी ऊपर है, लेकिन कई लोगों को ब्लॉग्स्पॉट के खाकों की आदत है, अतः नीचे भी दे रहा हूँ। वैसे लाइवजर्नल बुरा नहीं है।

टिप्पणी करें

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चिट्ठाजगत परीक्षण

देख रहा हूँ कि चिट्ठाजगत का लघु दावा कूट शीर्षक मात्र में चलता है या नहीं।

गब्बर

गब्बर - कितने आदमी थे?
सांभा - सरदार 2
गब्बर - मुझे गिनती नहीं आती, 2 कितने होते हैं?
सांभा - सरदार 2, 1 के बाद आता है
गब्बर - और 2 के पहले?
सांभा - 2 के पहले 1 आता है।
गब्बर - तो बीच में कौन आता है?
सांभा - बीच में कोई नहीं आता
गब्बर - तो फिर दोनो एक साथ क्यों नहीं आते?
सांभा - 1 के बाद ही 2 आ सकता है, क्यूँकि 2, 1 से बड़ा है।
गब्बर - 2, 1 से कितना बड़ा है?
सांभा - 2, 1 से 1 बड़ा है।
गब्बर - अगर 2, 1 से 1 बड़ा है तो 1, 1 से कितना बड़ा है?
सांभा - सरदार, मैंने आपका नमक खाया है, अब मुझे गोली खिला दो!

- दफ़्तर के सूचना पट से

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अपने घर पर
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3 (37.5%)

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हम अपनी कुर्सी पर हैं, ब्राउज़र पर नहीं!
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भारतीय रेल का मियादी बुखार

जब भी भारतीय रेल के अधिकृत सरकारी जालस्थल पर जा कर 9 तारीख का टिकट कटाने की कोशिश करता हूँ, भारत सरकार धोबी पछाड़ दे के 9 तारीख को आज की - 2 तारीख बना के कह देती है कि कोई ट्रेनें उपलब्ध नहीं हैं।

खैर, लालू ने भी रेलवे को मुनाफ़ेदार मालगाड़ियों के जरिए बनाया है, हम जैसे स्लीपर क्लासियों की बदौलत नहीं। पर यह भी हो सकता है कि ये जालस्थल का मियादी बुखार हो। लगता है कि शाम आठ से नौ के बीच का समय टिकट बुक कराने के लिए सबसे उम्दा है। आजमा के देखता हूँ कल रात। इस बीच नज़र डालिए पन्ना ए परिचय उल हिन्दी पर।

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अन्धा क़ानून - हिन्दी की पहली ग़ैर तकनीकी और ग़ैर साहित्यिक डाक सूची

क़ानूनी सलाह की सबको ज़रूरत पड़ती है। क़ानूनगोओं का यहाँ स्वागत है। यदि आपकी कोई क़ानूनी समस्या हो - ज़मीन जायदाद, व्यापार, नौकरी सम्बन्धी - तो यहाँ लिखें। हो सकता है कि आप वकील न हों, लेकिन वैसी ही स्थिति से गुज़र चुके हों। दी गई सलाह और उसपर अमल के नतीजे के लिए डाक सूची के सञ्चालक ज़िम्मेदार नहीं।



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मुम्बई बना बेरूत, हमारे दिमाग बने रेत

मुम्बई में अब तक 160 लोग मर चुके हैं और लोग गुण गा रहे हैं इस बात का कि अगले दिन यहाँ सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा जैसा कि पहले था। और छाती ठोक के कह रहे हैं कि मुम्बई हमेशा की तरह अपनी चिता से उठ कर फिर दौड़ने लगेगा।

मैं पूछता हूँ इसमें शान की क्या बात है कि अब तक पिछले तेरह सालों में चार इसी तरह के काण्ड हो चुके हैं?

1999 में मैं मुम्बई में था। रोज सान्ताक्रूज़ से अन्धेरी और वापस जाता था, सीप्ज़ में दफ़्तर था और जुहू में घर। शाम को छः बजे दफ़्तर से निकल जाता था तो खुश होता था, कि आज जल्दी घर पहुँचूँगा। और फ़र्स्ट क्लास का पास था, तो फ़र्स्ट क्लास से ही जाता था। उसी रूट पर, उसी समय, उसी डब्बे में मैं भी हो सकता था जिसपर बम फूटे हैं।

चौथी बार अपने शहर में बम फुटवाने में गर्व की क्या बात है, मुझे नहीं समझ आता। और मैं यदि उस डब्बे में होता तो मेरे घरवालो को भी समझ में नहीं आता।
अगर ये पहली बार हुआ होता, या फिर बतौर नागरिक हमें पता होता कि इससे बचने के लिए आगे क्या करना है, तो मुझे समझ आता कि अपनी छाती ठोकी क्यों जा रही है। लेकिन न हमे यह पता है कि अगले हमले कब होंगे और न यह पता है कि उनसे बचने के लिए आम नागरिक को क्या करना है।

बेरूत जब गृह युद्ध से जूझ रहा था उन्ही दिनो एक लेबनानी ने कुछ विदेशियों को दावत पर बुलाया। बाहर भारी बमबारी हो रही थी, सो विदेशी भौंचक्क थे कि ऐसी हालत में शराब और कबाब की दावत कैसे चल सकती है। यह देख कर मेज़बान ने कहा, 'क्या आप अभी जाम लगाना चाहेंगे, या फिर बमबारी के रुकने का इन्तज़ार करेंगे?' यानी वहाँ लोगबाग आम जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे और हिंसा जीवन का एक हिस्सा बन चुकी थी, एक मानी हुई बात, जिस तरह साँस लेते हैं, उसी तरह बमों की आवाज़ सुनते हैं।

अगर यही बहादुरी है और दिलेरी है तो हमसे शुतुरमुर्ग ही अच्छे। कम से कम अपना मन तो बहला लेता है, रेत में सर गाड़ कर। हम तो ऐसे बन रहे हैं कि बार बार उसी गड्ढे में कूद कर बहुत महान काम कर रहे हैं।

लन्दन में एक बार बम फूटे, न्यूयॉर्क में एक बार, माद्रिद में एक बार।

और मुम्बई में कितनी बार?

किसी कवि ने कहा है कि बहादुर एक ही बार मरता है पर कायर दिन में हज़ार बार मरता है।
मैं कहता हूँ कि जो दूध का जला छाछ तो छोड़ खौलते दूध तक को ठण्डा नही करता है उस महामूर्ख को लोग कुछ समय बाद जलाने में भी अपने समय की बरबादी ही समझेंगे।

एमएसएन हिन्दी में

तो माइक्रोसॉफ़्ट के एमएसएन पोर्टल का हिन्दी में प्रकाशन शुरू हो ही गया।

तकनीकी खबरों का भण्डार शून्य बता रहा है कि एमएसएन का हिन्दी रूप यहाँ मिलेगा -



http://msn.co.in/hindi



बढ़िया है। इनको कुछ लिखना हो तो फ़ीडबैक के जरिए लिख कर सुझाव दे सकते हैं।

एक अरब नकली डॉलर, वह भी ढाई सौ वाले

बीबीसी बता रहा है कि अमरीकियों को एक अरब नकली डॉलर मिले हैं, और ये डॉलर भी ढाई सौ के नोट हैं।
अपने यहाँ भी ढाई रुपए, साढ़े तीन, साढ़े नौ रुपए के नोट बनाने चाहिए - ऑटो वालों को देने के काम आएँगे।

मीटर बना - दस रुपए पचास पैसे। दस रुपए तो कम से कम है ही। ऊपर से अठन्नी जुड़ी। ऑटो वाले को बीस का नोट दिया।
ऑटो वाला: चिल्लर नहीं है। इलैवन रुपीज़ कुड़ी।
सवारी: कोई बात नहीं, बीस रुपए वापस लाओ।
सवारी फिर दो पाँच के नोट और एक ढाई रुपए का नोट देती है,
सवारी: दो रुपए लौटाओ।
ऑटो वाला थोड़ी देर को भौंचक्क लेकिन,
ऑटो: चिल्लर नहीं है।
सवारी: दस का नोट है? लाओ।
ऑटो वाला दस का नोट दे देता है। अब सवारी दो साढ़े तीन के नोट और एक रुपए का सिक्का लौटा देती है। चल गया बिना अठन्नी के काम।

ऑटो वाला भुनभुनाता हुआ निकलता है और वापसी सवारी न मिलने का बहाना भी नहीं मारा पता है, सवारी 'दिल चाहता है' गाते गाते आगे बढ़ जाती है।

दक्कनी हिन्दी

लम्बा चौड़ा लेख मिला है दक्कनी हिन्दी के बारे में।
और भी बहुत कुछ लिखा है यहाँ। अग़र आपने किसी ऑटो वाले से हिन्दी सुनी हो - वो बोल्या, ये गलीच है, क्या भी नहीं, काय कू, तो वो दक्कनी है।
मैं तो इसे ऑटो वालों की बोली माने बैठा था लेकिन इसका तो पूरा साहित्य, कवि भी हैं।

अब मैं जा को आता हूँ।

बङ्गलोर बनाम शेष भारत

मु्द्दा शेष भारत बङ्गलोर
फ़ुटपाथ क्या होता है? दुकान, मन्दिर, बूट पॉलिश की जगह टू व्हीलर के लिए रास्ता
ऑटो का ईंधन पेट्रोल या ऍलपीजी केरोसीन
पेट्रोल कहाँ से भराएँ पेट्रोल पम्प से पेट्रोल बङ्क से या गैस स्टेशन से
पुलिस वाले गाड़ी कैसे रोकते हैं हाथ दिखा के गाड़ी के सामने खड़े हो के
ट्रैफ़िक पुलिस को रिश्वत सौ रुपए सौ रुपए, आईटी में हो तो दो सौ
जानी दुश्मन पाकिस्तान तमिलनाडु
सबसे ज़्यादा नफ़रत किससे परवेज़ मुशर्रफ़ देव गौडा
समय बिताने के लिए सौरभ को क्यों निकाला / नेताओं में भ्रष्टाचार सड़कों के गड्ढे गिनना
अखबार की पहले पन्ने पर खबर संसद सदस्यों का भण्डाफोड़ नारायण मूर्ति जिस सड़क से गया उसमें कितने गड्ढे थे
अखबारों के सम्पादकीय गांगुली को निकालना चाहिए क्या? पब ग्यारह बजे बन्द क्यों हो जाते हैं?
अङ्ग्रेज़ी बोलने का लहज़ा देसी/इलाकाई कैलिफ़ोर्नियन/न्यू यॉर्की
भाषाएँ हिन्दी, अङ्ग्रेज़ी, क्षेत्रीय पृथ्वी पर बोली जाने वाली सारी भाषाएँ
ट्रैफ़िक जैम का कारक गाय भैंस पुल निर्माण, वीआईपियों का इन्फ़ोसिस में आना
ज़मीन पर कब्ज़ा करने वाले माफ़िया, गुण्डे आई टी कम्पनियाँ
ऐतिहासिक स्थल किले, दुर्ग, मीनारें अधबने पुल
सरकार से शिकायत आलसी, भ्रष्ट जालस्थल नहीं है, डाक बाउंस हो जाती है
जब परेशानी हो तो परेशानी है कुछ इशूज़ रिज़ॉल्व नहीं हो रहे
अठारह किलोमीटर सफ़र का समय अठारह मिनट से चौबीस मिनट पाव दिन से आधा दिन
न्यूनतम रकम जो ऑटोवाले को ज्ञात हो - राउण्ड ऑफ़ के लिए अठन्नी पाँच या दस रुपए
सुबह मिलने का समय आठ से नौ बजे टेन-टेन थर्टी?
मकान मालिक द्वारा लिया ऐड्वांस एक महीने का किराया दस महीने का किराया
शनिवार इतवार को क्या कर रहे हो रिश्तेदारों से मिलना, घर पर टीवी देखना घर बुक कराना है, देखने जा रहे हैं
क्षेत्रीय भाषा में बात करने पर जवाब उसी भाषा में जवाब आई डोण्ट अण्डर्स्टैण्ड कन्नडा
साइबरकैफ़े कहाँ है? कैफ़े? अच्छा इण्टर्नेट? पता नहीं। दस कदम चलो तो चार मिलेंगे
साइबर कैफ़े में फ़ायर्फ़ाक्स चाहिए वो सब हमें नहीं पता पहले से ही है, नया वर्ज़न चाहिए तो डाउनलोड कर लो
सुबह नाश्ते का समय नौ बजे दुकानें खुलेंगी छः बजे से इडली दोसा सब कुछ मिलेगा
आई टी कम्पनी में काम करता हूँ अच्छा आप कम्प्यूटर बनाते हो? हाँ, पर कौन सी?
इन्फ़ोसिस में काम करता हूँ अच्छा, हमारे मामे का लड़के का साला भी है वहीं पर। आप जानते हैं? ओह। मैं भी। कौन सी बिल्डिङ्ग में हो?
जान पहचान बढ़ाना आपका घर कहाँ पर है? कागज़ पर लिख दीजिए आपका ईमेल ऍड्रेस क्या है? मेल करता हूँ।
पता बताना मकान नम्बर, ब्लॉक नम्बर, मुहल्ले का नाम पहले जयनगर आओ, वहाँ मन्दिर है, वहाँ से सीधे जा के दाएँ, फिर एक गली आएगी, वहाँ पीपल का पेड़ है, ...
फ़्रिज आज शाम को ही भिजवा देंगे होम डिलवरी मुफ़्त, साथ में कलैण्डर भी तीन दिन बाद आएगा, और बक्शीश माँगेगा (ट्रैफ़िक बहुत था न)
इस दुकान में सामान सस्ता है चलो यहीं चलते हैं कार्ड नहीं लेता यार। छोड़।
भारतीय मुद्रा रुपए बक्स

पठार-ए-सैकता में महिला दिवस

मेरी कम्पनी वाले आज महिला दिवस मना रहे हैं।
अचानक क्या चक्कर है?
बाहर शामियाना लगा है, लोग महिलाओं के बारे में सूक्तियाँ बाँच रहे हैं।
चक्कर क्या है?
चक्कर घूम फिर कर वहीं आता है -
दादा बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपइया।

महिलाएँ अक्सर दफ़्तर की हालातों और घर की परेशानियों से जूझते हुए बहुत कुछ सीख कर, काम कर के, अन्ततः थक हार के सब कुछ छोड़ छाड़ देती हैं।
तो अपनी अठन्नियाँ बचाने के लिए अपनी कम्पनियों ने रेवड़ी आवण्टन अभियान शुरू कर दिया है।
बस, और कुछ नहीं।

सीमंस ने दिया जवाब

खबर थोड़ी बासी है लेकिन गौर लायक है।
सीमंस वालों ने बङ्गलोर के आगे हाथ जोड़ लिए हैं। क्या करें वो भी। रोज सुबह शाम तो झेलते ही हैं।
हम आपका दर्द समझ सकते हैं। भारी भरकम यातायात समस्या को मद्देनज़र सीमंस ने निश्चय किया है कि वे बङ्गलोर में और बढ़ोतरी नहीं करेंगे, और साथ ही आधा दर्जन और शहरों के नाम गिना दिए हैं जहाँ पर वे बढ़ोतरी करने को इच्छुक हैं।
केम्पे क्या सोचता होगा?

है ख़बर गर्म - चीन

बीबीसी कह रही है तो सच ही होगा।
चीन सभी देशों को अमीरी में पछाड़ देगा। थोड़ा समय है, 2050 तक। अभी भी पर्चेज़िङ्ग पॉवर पॅरिटी - खरीद शक्ति - के आधार पर चीनी अमरीकियों के तीन पाव के बराबर पहुँच चुके हैं। हाँ, चीन में लोग ज़्यादा हैं सो प्रति व्यक्ति कम होगा। लेकिन जब तक कॉम्रेड लोग गद्दी पर है, कोई चिन्ता नहीं।

तन्ख्वाह-ए-सैकता

यह सर्वेक्षण कुछ तो कहना चाह रहा है - एक तो यह कि तन्ख्वाहें बढ़ी हैं, लेकिन जनता जनार्दन को पैसे के अलावा "कुछ और" चाहिए।

क्या है वह और?

अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं ? दीवाने हुए पागल == There's Something About Mary


Akshargram Anugunj

इस अनुगूँज (ये अनुगूँज है क्या बला?) के बारे में लिखते हुए बताता हूँ आपको इस हफ़्ते की ताज़ी फ़िल्म दीवाने हुए पागल या फिर कहना चाहिए Deewane Huye Paagal क्योंकि पूरी फ़िल्म में कहीं भी इसका नाम हिन्दी में नहीं लिखा है - ख़ैर वह अलग बात है, जिसके बारे में [info]v9y भी अन्यत्र लिख चुके हैं - और अमिताभ बच्चन को भी इसके बारे में पूछते पूछते रह गए थे - कड़ी नहीं मिल रही है उस वर्णन की - तो मैं ये कह रहा था कि ये फ़िल्म - दीवाने हुए पागल - देर्स सम्थिङ्ग अबाउट मैरी की टोपो मारी है। कुछ सीन तो एकदम वैसे के वैसे उठा डाले हैं। और ये फ़िल्म 1998 में आई थी, लेकिन ब्रिगेड रोड पर रेक्स में लगा नहीं कि लोगों को ये चमका है। यार सात साल ज़्यादा तो नहीं होते। पर मैंने भी अभी ही टीवी पे देखी थी, इसलिए उतना मज़ा नहीं आया इसे देख के। लेकिन, अग़र आप इस बात को नज़रन्दाज़ कर दें तो काफ़ी हँसोड़ फ़िल्म है।

पर सवाल तो ये है कि हम फ़िल्में क्यों देखते हैं? वैसे तो दो तीन घण्टे बहुत लम्बा समय होता है - इतना समय मैं शायद ही किसी एक गतिविधि में लगातार बिताता हूँ - सिवाय सोने के। और वैसे भी बङ्गलोर में जो गाड़ियों की बाढ़ है और सड़कों का सँकरापन है तो अपने जैसे लोग जो ट्रैफ़िक कटर का इस्तेमाल नहीं करते, इतनी दिलेरी नहीं दिखा पाते कि हर बार थियेटर में जा के देखें। लेकिन सीडी या डीवीडी में भी पङ्गा ही है कि आधे रास्ते बन्द हो जाती है।

तो पहले देखते हैं कि मुझे फ़िल्में अच्छी कौन सी लगी हैं - फिर देखते हैं कि वो मुझे अच्छी क्यों लगी - इससे साफ़ हो जाएगा - ये तो नहीं कि हम क्यों देखते हैं फ़िल्में - पर इतना तो साफ़ हो जाएगा कि मैं फ़िल्में देखता क्यों हूँ।

कुछ फ़िल्में जो मुझे याद हैं -
क्रेमर वर्सस क्रेमर
ये वो मञ्ज़िल तो न थी
एक रुका हुआ फ़ैसला
एक क्यूबन फ़िल्म - नाम नहीं याद।
एक फ़्रांसीसी फ़िल्म - प्रेम कहानी जिसमें अन्त में दोनो लोग कङ्क्रीट के अन्दर दफ़न हो जाते हैं।
प्रिडेटर
ईटी

आदि।
ये फ़िल्में क्यों याद हैं मुझे - इनमें से कइयों की तो सीडी या डीवीडी भी खोजने से नहीं मिलेगी - क्योंकि इन्होंने ज़िन्दगी का नया नज़रिया मेरे सामने पेश किया - जिसके आस्तित्व के बारे में मुझे पहले गुमान भी नहीं था। इस तरह मेरे सोचने का दायरा बढ़ाया, और इस की वजह से एक आनन्द का आभास हुआ। तो कह सकते हैं कि दूसरों की दुनिया में झाँकने के लिए, या कोई और नज़रिया पाने के लिए मैं फ़िल्में देखता हूँ।

जो चीज़ सामने हासिल नहीं हो सकती, उसको दूसरों के जरिए अनुभव करने के लिए देखता हूँ मैं फ़िल्में।

हाँ, इस सब के बाद भी, कभी कभी लगता है कि असली ज़िन्दगी फ़िल्मी दुनिया से कहीं ज़्यादा फ़िल्मी है। आपको लगता है क्या? मसलन, क्या आपने कभी सोचा था, आप इस वक़्त जहाँ बैठे हैं, अभी वहीं बैठे होंगे, और वही कर रहे होंगे जो आप अभी कर रहे हैं, और वही सोच रहे होंगे जो आप अभी सोच रहे हैं?

यार मेरा भी दर्द समझो

जयनगर में एक साइबर कैफ़े में बैठा हूँ और बगल में बैठा ढक्कन अपने रूममेट को फ़ोन पर ज़ोर ज़ोर से मुर्गी बनाना सिखा रहा है। हद होती है यार। वो भी हैऩ्ड्स फ़्री के साथ । यहाँ पर विऩ्डोज़ 98 है इसलिए लिखने के लिए http://devanaagarii.net/inscript</> का इस्तेमाल किया।

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