मुम्बई में अब तक 160 लोग मर चुके हैं और लोग गुण गा रहे हैं इस बात का कि अगले दिन यहाँ सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा जैसा कि पहले था। और छाती ठोक के कह रहे हैं कि मुम्बई हमेशा की तरह अपनी चिता से उठ कर फिर दौड़ने लगेगा।
मैं पूछता हूँ इसमें शान की क्या बात है कि अब तक पिछले तेरह सालों में चार इसी तरह के काण्ड हो चुके हैं?
1999 में मैं मुम्बई में था। रोज सान्ताक्रूज़ से अन्धेरी और वापस जाता था, सीप्ज़ में दफ़्तर था और जुहू में घर। शाम को छः बजे दफ़्तर से निकल जाता था तो खुश होता था, कि आज जल्दी घर पहुँचूँगा। और फ़र्स्ट क्लास का पास था, तो फ़र्स्ट क्लास से ही जाता था। उसी रूट पर, उसी समय, उसी डब्बे में मैं भी हो सकता था जिसपर बम फूटे हैं।
चौथी बार अपने शहर में बम फुटवाने में गर्व की क्या बात है, मुझे नहीं समझ आता। और मैं यदि उस डब्बे में होता तो मेरे घरवालो को भी समझ में नहीं आता।
अगर ये पहली बार हुआ होता, या फिर बतौर नागरिक हमें पता होता कि इससे बचने के लिए आगे क्या करना है, तो मुझे समझ आता कि अपनी छाती ठोकी क्यों जा रही है। लेकिन न हमे यह पता है कि अगले हमले कब होंगे और न यह पता है कि उनसे बचने के लिए आम नागरिक को क्या करना है।
बेरूत जब गृह युद्ध से जूझ रहा था उन्ही दिनो एक लेबनानी ने कुछ विदेशियों को दावत पर बुलाया। बाहर भारी बमबारी हो रही थी, सो विदेशी भौंचक्क थे कि ऐसी हालत में शराब और कबाब की दावत कैसे चल सकती है। यह देख कर मेज़बान ने कहा, 'क्या आप अभी जाम लगाना चाहेंगे, या फिर बमबारी के रुकने का इन्तज़ार करेंगे?' यानी वहाँ लोगबाग आम जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे और हिंसा जीवन का एक हिस्सा बन चुकी थी, एक मानी हुई बात, जिस तरह साँस लेते हैं, उसी तरह बमों की आवाज़ सुनते हैं।
अगर यही बहादुरी है और दिलेरी है तो हमसे शुतुरमुर्ग ही अच्छे। कम से कम अपना मन तो बहला लेता है, रेत में सर गाड़ कर। हम तो ऐसे बन रहे हैं कि बार बार उसी गड्ढे में कूद कर बहुत महान काम कर रहे हैं।
लन्दन में एक बार बम फूटे, न्यूयॉर्क में एक बार, माद्रिद में एक बार।
और मुम्बई में कितनी बार?
किसी कवि ने कहा है कि बहादुर एक ही बार मरता है पर कायर दिन में हज़ार बार मरता है।
मैं कहता हूँ कि जो दूध का जला छाछ तो छोड़ खौलते दूध तक को ठण्डा नही करता है उस महामूर्ख को लोग कुछ समय बाद जलाने में भी अपने समय की बरबादी ही समझेंगे।
|
December 2007
|
मुम्बई बना बेरूत, हमारे दिमाग बने रेत
(Anonymous)
मुझे एक दूसरी बात समझ में नही आती| बम बिस्फोटों के बाद निन्दा के वक्तव्य का क्या मतलब है| ये फालतू के कर्मकाण्ड क्यों? क्यों नहीं हम भारत में आतंक की जड को हम क्यों नहीं देख पा रहे हैं? यदि देख रहें हैं तो उस पर प्रहार करने में सकुचा क्यों रहे हैं? अगर मुंबई का आम आदमी इन घटनाौओ' को रोक सकता, आलोक भाई, तब तो फिर बात ही क्या थी. आज कम-स-कम आम आदमी, हिंदू मुसलमान इसाई में बिना भेदभाव के एक दूसरे को सहारा तो दे रहा है! मुझे अच्छी तरह याद हैं वो 1992-93 के दंगे जिन्होंनें मुझे ज्यादा दहशत दी थी- मैं उन दिनों बंबई में ही थी. और फिर 12 मार्च 1993 को जब बम फटे तब भी (उसी वक्त) मैं नरीमन पांइट से दादर जा रही थी टैक्सी में तारिक को रिसीव करने. मैं भी हो सकती थी वहीं कहीं बम के आसपास एयर इंडिया के बगल में अगर 15 मिनिट लेट निकलती या फिर वरली में अगर जल्दी निकली होती. मगर अगले दिन, चूंकि मैं नहीं थी उन बमों की शिकार मुझे तो बंबइया जिन्दगी की रफ्तार के साथ ही बहना था!! हाँ अगर नागपूर जैसे छोटे शहर में इस तरह का हादसा होता तो बात अलग होती. कहने का मतलब यह कि लोगों का कोई दोश नहीं दोश है बंबई की रफ्तार का. अफ़सोस
शहर के लोगों की तो मैं प्रशंसा ही करूँगा, मजबूरी में ही, जैसा आपने कहा, उन्हे शहर की रफ़्तार से चलना है। दोषी मैं ठहरा रहा हूँ अपने पत्रकारों को जो केवल उन्हीं की प्रशंसा तक सीमित हैं। कल दोबारा ऐसा न हो इसके लिए क्या कदम उठाए जाएँ उसके बारे में कुछ नहीं - न कोई बहस न सुझाव। इससे तो इसरो वाले अच्छे हैं, मिसाइल और उपग्रह खराब होने पर ठण्डे दिमाग से सोचते तो हैं कि आगे इससे बचने को क्या करेंगे। (Anonymous)
आतंकियों का बड़ा उद्देश्य क़ौमी दंगे भड़काना है. ये क्या कम बड़ी बात है कि इस्लामी चरमपंथी अपनी इस साज़िश में कामयाब नहीं हुए. मुंबई को दंगे-फ़साद से पहले क्या मिला था जो अब करने से मिल जाएगा? जिन्होंने बम रखना था वे निकल गए. बाद के दंगों में उनका क्या जाता. ज़िंदगी की जद्दोजहद में जुटा आम आदमी इन दंगों का पहला शिकार होता है. ना तो नेता मरते है और ना ही विचारक. अलबत्ता पत्रकारों को यह सब लाइव करने के लिए जान जोख़िम में डालना पड़ता है. गर्व इस बात का है कि हम आतंकियों की घिनौनी साज़िशों का शिकार नहीं हुए. वे चाहे अयोध्या पर हमला करें या मुंबई में.. हम सांप्रदायिकता की आग में देश को नहीं धुंकने देंगे. आगे सुरक्षा तंत्र की विफलता की बात है तो उस पर मैंने भी कुछ लिखा है. वो विचारणीय मुद्दा है और उस पर मुझे गर्व नहीं है बल्क़ि अफ़सोस है कि हमारी सरकार कूटनीतिक मोर्चे पर भी पिछड़ रही है. |
