पठार-ए-सैकता
क्या है आख़िर ये? सैकता यानि सिलिकॉन, तो यह लेखा पठार-ए-सैकता यानी बङ्गलोर के बारे में है।
उसकी सड़कों के बारे में नहीं, राजनीति के बारे में भी नहीं, बस सिर्फ़ मेरे उन अनुभवों के बारे में जो कि मुझे पठार-ए-सैकता में, बतौर कारीगर-ए-पठार-ए-सैकता, होते रहते हैं। उनमें सड़कों और राजनीति के बारे में भी जिक्र होगा, कि ये मेरे साथ कैसे पेश आए।
यह लेखा इसलिए लिखा गया है कि इस लेखे की दुनिया में सब कुछ मेरे चारों ओर घूमता है, और जो नहीं घूमता, उसे मैं कोसूँगा और गालियाँ दूँगा। क्योंकि मैं केन्द्र जो ठहरा।
मेरा एक और चिट्ठा है, नौ-दो-ग्यारह, जहाँ मैं अब तक तो लगभग सभी कुछ लिखता रहता हूँ, और जिस तरह दूसरों के चिट्ठों में कुछ दिलचस्प बातें पढ़ के उनमें दिलचस्पी बढ़ती है, लेकिन फिर बाद में तरह तरह की बेसिरपैर की बातें सुन के लगता है कि ये सटक क्यों गया, उसी तरह, बाकियों को भी मेरा चिट्ठा पढ़ के लगता होगा। पुराने चिट्ठे पर मशीनों और अन्तर्जाल से सम्बन्धित बातों के बारे में लिखता रहूँगा।
इसलिए ये चिट्ठा, जिसमें मैं रोजमर्रा की बातें करूँगा, और कुछ पुरानी बातें लिखूँगा। लाइवजर्नल पर समुदाय बहुत तगड़े हैं, इसलिए सामुदायिक बातें होंगी।
तो, खूब जमेंगे, आप, मैं और बैगपाइपर।
और बेटा, इतना पढ़ लिया तो टिप्पणी लिखनी पढ़ेगी। चल चटका मार। लाइवजर्नल ज़िन्दा हो चुका है।
Why can't I see the Hindi section?
Current Mood: accomplished
Current Music: पत्थर के सनम