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आलोक कुमार
alok
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December 2007
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तार बेतार, हाल बेहाल

पता लगा कि ब्रोडबैण्ड मेरे घर में लग ही नहीं सकता क्योंकि हमारा फ़ोन कनेक्शन फ़ाइबर ऑप्टिक से है, उसके लिए फ़ोन कम्पनी वालों को कुछ और उपकरण लगाने पड़ेंगे। तो फिर इतने गड्ढे काहे खोदे थे भइया? और वह भी पिछले दो सालों से।

लगता है गड़ा धन खोज रहे थे।

अब कह रहे हैं कि दो महीने लग जाएँगे।

अब हालत यह है कि दफ़्तर में ही अन्तर्जाल पर सभी ग़लत, ग़ैर-क़ानूनी और ऊलजुलूल काम करने पड़ते हैं, क्योंकि घर पर तो टाँय टाँय फ़िस्स है। पर उसमें कोई नई बात थोड़े ही है। बहती कावेरी में हाथ धोना पठार-ए-सैकता के शाही बाशिन्दों के लिए आम बात है, इसमें उन्हें न शर्म आती है न झिझक। बेटा अग़र किसी दिन बॉस ने मेरे लॉगिन के ऍक्सेस लॉग्स देख लिए तो वाट लग जाएगी, मुन्ना भाई भी नहीं बचा पाएगा।

लेकिन ग़लती मेरी थोड़ी है, या तो बेङ्गलूरु महानगर पालिका की है, या बी ऍस ऍन ऍल की है।

सिलिकॉन वॅली का डायलप भी यहाँ के ब्रोड्बॅण्ड को मात देता है। एक बार पकड़ ले तो बिना टूटे अट्ठारह घण्टे चले, यहाँ अट्ठारह सेकिण्ड में टें बोल जाती है। अब मैं घर जा के क्वालिटी टाइम कैसे स्पेण्ड करूँ? दफ़्तर में ही रुकना पड़ेगा न?

Why can't I see the Hindi section?

Current Mood: devious devious
Current Music: सैया भए कोतवाल तो डर काहे का
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