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आलोक कुमार
alok
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December 2007
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पेल दिया नन्दन ने!

नन्दन ने सुना ही दिया।
नन्दन कह रहा है कि 1830 में चीन और भारत में दुनिया का आधा धन्धा चलता था। तो अब हम तुम्हारी वाट लगा रहे हैं तो कौन सी बड़ी बात है!
और भी बोला: इतने साल तक तुम हमें बोलते रहे कि अपनी दुकान खोलो, और अब खोल दी तो बन्द करने का राग अलाप रहे हो?
ये सब नीतियाँ वीतियाँ दिखावा ही होती हैं, अपना उल्लू सीधा करने के लिए। तो हम भी क्यों न करें?
लगे रहो बेटा!
पर मुझे लगता है ऍक्सेञ्चुर वगैरह ज़्यादा समय तक पीछे नहीं रहेंगी।

घुघ्घी मारो घुघ्घी

यहाँ पर है प्रार्थना पत्र जिसमें आईआईपीऍम से खुलासा माँगा गया है। शुरूआत हुई है एक लेख से, और बात यहाँ तक आ पहुँची है

मुझे पता है कि कोई भी कागज़ी अखबार या पत्रिका इसके बारे में कुछ नहीं छापने वाले हैं। इसलिए ज़रूरी है कि आप सभी इसके बारे में अपने चिट्ठे पर चर्चा करें।

और इस प्रार्थना पत्र पर भी अपनी घुघ्घी लगाएँ।

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