
इस अनुगूँज (ये अनुगूँज है क्या बला?) के बारे में लिखते हुए बताता हूँ आपको इस हफ़्ते की ताज़ी फ़िल्म दीवाने हुए पागल या फिर कहना चाहिए Deewane Huye Paagal क्योंकि पूरी फ़िल्म में कहीं भी इसका नाम हिन्दी में नहीं लिखा है - ख़ैर वह अलग बात है, जिसके बारे में
v9y भी अन्यत्र लिख चुके हैं - और अमिताभ बच्चन को भी इसके बारे में पूछते पूछते रह गए थे - कड़ी नहीं मिल रही है उस वर्णन की - तो मैं ये कह रहा था कि ये फ़िल्म - दीवाने हुए पागल - देर्स सम्थिङ्ग अबाउट मैरी की टोपो मारी है। कुछ सीन तो एकदम वैसे के वैसे उठा डाले हैं। और ये फ़िल्म 1998 में आई थी, लेकिन ब्रिगेड रोड पर रेक्स में लगा नहीं कि लोगों को ये चमका है। यार सात साल ज़्यादा तो नहीं होते। पर मैंने भी अभी ही टीवी पे देखी थी, इसलिए उतना मज़ा नहीं आया इसे देख के। लेकिन, अग़र आप इस बात को नज़रन्दाज़ कर दें तो काफ़ी हँसोड़ फ़िल्म है।
पर सवाल तो ये है कि हम फ़िल्में क्यों देखते हैं? वैसे तो दो तीन घण्टे बहुत लम्बा समय होता है - इतना समय मैं शायद ही किसी एक गतिविधि में लगातार बिताता हूँ - सिवाय सोने के। और वैसे भी बङ्गलोर में जो गाड़ियों की बाढ़ है और सड़कों का सँकरापन है तो अपने जैसे लोग जो ट्रैफ़िक कटर का इस्तेमाल नहीं करते, इतनी दिलेरी नहीं दिखा पाते कि हर बार थियेटर में जा के देखें। लेकिन सीडी या डीवीडी में भी पङ्गा ही है कि आधे रास्ते बन्द हो जाती है।
तो पहले देखते हैं कि मुझे फ़िल्में अच्छी कौन सी लगी हैं - फिर देखते हैं कि वो मुझे अच्छी क्यों लगी - इससे साफ़ हो जाएगा - ये तो नहीं कि हम क्यों देखते हैं फ़िल्में - पर इतना तो साफ़ हो जाएगा कि मैं फ़िल्में देखता क्यों हूँ।
कुछ फ़िल्में जो मुझे याद हैं -
क्रेमर वर्सस क्रेमर
ये वो मञ्ज़िल तो न थी
एक रुका हुआ फ़ैसला
एक क्यूबन फ़िल्म - नाम नहीं याद।
एक फ़्रांसीसी फ़िल्म - प्रेम कहानी जिसमें अन्त में दोनो लोग कङ्क्रीट के अन्दर दफ़न हो जाते हैं।
प्रिडेटर
ईटी
आदि।
ये फ़िल्में क्यों याद हैं मुझे - इनमें से कइयों की तो सीडी या डीवीडी भी खोजने से नहीं मिलेगी - क्योंकि इन्होंने ज़िन्दगी का नया नज़रिया मेरे सामने पेश किया - जिसके आस्तित्व के बारे में मुझे पहले गुमान भी नहीं था। इस तरह मेरे सोचने का दायरा बढ़ाया, और इस की वजह से एक आनन्द का आभास हुआ। तो कह सकते हैं कि दूसरों की दुनिया में झाँकने के लिए, या कोई और नज़रिया पाने के लिए मैं फ़िल्में देखता हूँ।
जो चीज़ सामने हासिल नहीं हो सकती, उसको दूसरों के जरिए अनुभव करने के लिए देखता हूँ मैं फ़िल्में।
हाँ, इस सब के बाद भी, कभी कभी लगता है कि असली ज़िन्दगी फ़िल्मी दुनिया से कहीं ज़्यादा फ़िल्मी है। आपको लगता है क्या? मसलन, क्या आपने कभी सोचा था, आप इस वक़्त जहाँ बैठे हैं, अभी वहीं बैठे होंगे, और वही कर रहे होंगे जो आप अभी कर रहे हैं, और वही सोच रहे होंगे जो आप अभी सोच रहे हैं?
