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आलोक कुमार
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December 2007
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मुम्बई बना बेरूत, हमारे दिमाग बने रेत

मुम्बई में अब तक 160 लोग मर चुके हैं और लोग गुण गा रहे हैं इस बात का कि अगले दिन यहाँ सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा जैसा कि पहले था। और छाती ठोक के कह रहे हैं कि मुम्बई हमेशा की तरह अपनी चिता से उठ कर फिर दौड़ने लगेगा।

मैं पूछता हूँ इसमें शान की क्या बात है कि अब तक पिछले तेरह सालों में चार इसी तरह के काण्ड हो चुके हैं?

1999 में मैं मुम्बई में था। रोज सान्ताक्रूज़ से अन्धेरी और वापस जाता था, सीप्ज़ में दफ़्तर था और जुहू में घर। शाम को छः बजे दफ़्तर से निकल जाता था तो खुश होता था, कि आज जल्दी घर पहुँचूँगा। और फ़र्स्ट क्लास का पास था, तो फ़र्स्ट क्लास से ही जाता था। उसी रूट पर, उसी समय, उसी डब्बे में मैं भी हो सकता था जिसपर बम फूटे हैं।

चौथी बार अपने शहर में बम फुटवाने में गर्व की क्या बात है, मुझे नहीं समझ आता। और मैं यदि उस डब्बे में होता तो मेरे घरवालो को भी समझ में नहीं आता।
अगर ये पहली बार हुआ होता, या फिर बतौर नागरिक हमें पता होता कि इससे बचने के लिए आगे क्या करना है, तो मुझे समझ आता कि अपनी छाती ठोकी क्यों जा रही है। लेकिन न हमे यह पता है कि अगले हमले कब होंगे और न यह पता है कि उनसे बचने के लिए आम नागरिक को क्या करना है।

बेरूत जब गृह युद्ध से जूझ रहा था उन्ही दिनो एक लेबनानी ने कुछ विदेशियों को दावत पर बुलाया। बाहर भारी बमबारी हो रही थी, सो विदेशी भौंचक्क थे कि ऐसी हालत में शराब और कबाब की दावत कैसे चल सकती है। यह देख कर मेज़बान ने कहा, 'क्या आप अभी जाम लगाना चाहेंगे, या फिर बमबारी के रुकने का इन्तज़ार करेंगे?' यानी वहाँ लोगबाग आम जीवन जीने की कोशिश कर रहे थे और हिंसा जीवन का एक हिस्सा बन चुकी थी, एक मानी हुई बात, जिस तरह साँस लेते हैं, उसी तरह बमों की आवाज़ सुनते हैं।

अगर यही बहादुरी है और दिलेरी है तो हमसे शुतुरमुर्ग ही अच्छे। कम से कम अपना मन तो बहला लेता है, रेत में सर गाड़ कर। हम तो ऐसे बन रहे हैं कि बार बार उसी गड्ढे में कूद कर बहुत महान काम कर रहे हैं।

लन्दन में एक बार बम फूटे, न्यूयॉर्क में एक बार, माद्रिद में एक बार।

और मुम्बई में कितनी बार?

किसी कवि ने कहा है कि बहादुर एक ही बार मरता है पर कायर दिन में हज़ार बार मरता है।
मैं कहता हूँ कि जो दूध का जला छाछ तो छोड़ खौलते दूध तक को ठण्डा नही करता है उस महामूर्ख को लोग कुछ समय बाद जलाने में भी अपने समय की बरबादी ही समझेंगे।

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