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आलोक कुमार
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December 2007
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आलोक कुमार [userpic]
वर्जिश

चिट्ठों की दुनिया में वर्जिश का ज़ोर चल रहा है। और मेरा भी तीसरा दिन हो गया लगातार एक घण्टे चलने का। बड़ी बात है मेरे लिए। ठान लिया है कि गुलामी करने जाऊँगा तब जब कसरत हो जाएगी। नहीं तो क्या फ़ायदा? लफ़ड़ा है अग़र सुबह सुबह मीटिङ्ग हो। लेकिन सैया भए कोतवाल तो डर काहे का। देखते हैं बकरी की माँ कब तक खैर मनाती है। वैसे भी इस शहर में किसी से भी मिलने की बात करो तो यही होता हो, जो मेरे मुम्बई से आए एक दोस्त के साथ हुआ था।

दोस्त: आई वाण्ट टु कम टु सी युअर प्लेस सो दैट आई कॅन टेक इट फ़ॉर रेण्ट।
बङ्गलोरी: ओके, टुमॉरो यू कैन कम ऐनी टाइम। व्हेयर डू यू स्टे?
दोस्त: कलासीपाल्यम
बङ्गलोरी: ओके, कलासीपाल्यम टु कोरमङ्गला विल टेक यू सम हाफ़ ऍन आवर। (दो साल पुरानी बात है)
दोस्त: ओके, देन आई विल कम टु युअर प्लेस ऍट एट ओ क्लॉक।
बङ्गलोरी: एट ओ क्लॉक! नो नो। इट्स टू अर्ली। यू कम बाई टेन - टेन-थर्टी।
दोस्त: (आँय। अच्छा है तू मुम्बई में नहीं रहता वरना तेरी पहले दिन ही वाट लग जाती) ओके। आई विल कम ऍट टेन ओ क्लॉक।

तो यहाँ 10-10:30 के पहले न कोई दुकान खुलती है न कोई काम के लिए किसीसे मिलने जाता है। और ऐसा भी नहीं कि लोग देर रात तक काम करते हों। रात में भी 10-10:30 तक घोड़े बिक जाते हैं।

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Current Music: आहिस्ता, आहिस्ता