?

Log in

आलोक कुमार
alok
................................

December 2007
            1
2 3 4 5 6 7 8
9 10 11 12 13 14 15
16 17 18 19 20 21 22
23 24 25 26 27 28 29
30 31

आलोक कुमार [userpic]
दक्कनी हिन्दी

लम्बा चौड़ा लेख मिला है दक्कनी हिन्दी के बारे में।
और भी बहुत कुछ लिखा है यहाँ। अग़र आपने किसी ऑटो वाले से हिन्दी सुनी हो - वो बोल्या, ये गलीच है, क्या भी नहीं, काय कू, तो वो दक्कनी है।
मैं तो इसे ऑटो वालों की बोली माने बैठा था लेकिन इसका तो पूरा साहित्य, कवि भी हैं।

अब मैं जा को आता हूँ।

Comments
(Anonymous)
मत्सु

आलोक जी, आज तक मैं केवल "काय कू" ही जानता थ, और फ़िल्मों में बार-बार सुनकर सोचा था कि वह मुंबइया हिंदी की बोली होगी.
लेकिन दक्खनी!! यह बात दिलचस्प लगती है, अभी लिंक से जाकर ज़रा आगे पढ़ लेता हूँ.

कुछ हफ़्तों पहले बीबीसी उर्दू में भी दक्खनी हिंदी (हैदराबादी उर्दू) के बारे में देखा है.
(http://www.bbc.co.uk/urdu/india/story/2006/02/060204_hyderabad_language.shtml)
उसके मुताबिक़ दक्खनी(हैदराबादी) की ऐसी ख़ासियत भी है;

-"कहना" की जगह "बोलना"
"इन्हो बोले", यानी "इन्होंने कहा"

-"नको"(या, "नकू"?? उर्दू लिपि की वजह से साफ़ नहीं है)
मतलब "नहीं चाहिए", "मत कीजिए", "रहने दीजिए"

-"परसों" का मतलब सिर्फ़ "दो दिन पहले" से सीमित नहीं
यानी "दो महीने पहले" भी हो सकता है.