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आलोक कुमार
alok
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December 2007
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बदतमीज़ लोग, ढक्कन लोग

पठार-ए-सैकता के बाशिन्दे जब सिलिकॉन वॅली पहुँच जाते हैं तो शराफ़त के पुतले हो जाते हैं, और अपने घर में महा बद्तमीज़।

आज दफ़्तर में एक दरवाज़ें को पार करना था, यहाँ के सभी दफ़्तरों की तरह यहाँ भी दरवाज़ें काँच के हैं, यानी कि आप देख सकते हैं कि दूसरी तरफ़ से कौन आ रहा है। मैं बाहर जा रहा था और बद्तमीज़ महाशय अन्दर। दो पल्लों का दरवाज़ा। महाशय ने देखा कि मैं दरवाज़े तक पहले पहुँच जाऊँगा, तो भाग के पहले पहुँच गए द्वार के निकट और मस्ती से पार हो लिए। यही महाशय सिलिकॉन वॅली में किसी गोरे या कहें गोरी को आते देखते तो भी दौड़ के दरवाज़ा तो लपकते, लेकिन खोलते अगले की तरफ़ वाला पल्ला, फ़िर किनारे हो के मुस्कुराते और मुझे - अर्थात् उस फ़िरङ्गी को पहले निकलने देते, साथ ही एक "हावर्यू डुइङ्ग?" भी चेंप देते भले ही पहले कभी उसकी शक्ल भी न देखी होती।

ख़ैर इस बुरे, कड़वे अनुभव के बाद जब अगला दरवाज़ा आया तो मैंने सोचा कि क्यों न मैं अच्छा उदाहरण पेश करूँ, तो जैसे ही मैंने पल्ला खोला तो उस तरफ़ वाले बन्दे पहले ही पासे हो गए कि इसने तो पहले ही लपक लिया। फ़िर भी मैं मुस्कुराया, और किनारे भी हुआ, लेकिन तब तक भी दूसरे तरफ़ वाले ढक्कन लोग भौंचक के भौचक्क ही थे। हताश हो के पहले खुद ही निकलना पड़ा।

गवाह चुस्त, मुद्दई सुस्त।


Why can't I see the Hindi section?

Current Mood: frustrated frustrated
Current Music: रात के बारह बजे
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